वो छोटी सी बच्ची, चोटी में बंधा रिबन,
हाथ में झंडा, आँखों में भ्रम…
ना जाने क्या है धर्म, ना जाने राष्ट्र,
बस सुनती है “जय बोलो!” और दोहराती है वही…
कभी उसने मंदिर देखा है बस दीयों के लिए,
ना नफ़रत जानी, ना टकराव के सिलसिले…
पर आज वो शामिल है किसी धर्म यात्रा में,
जहाँ सवाल नहीं, बस आदेश है बातों के पहरे में…
वो सोचती है — “क्या खेल ख़त्म हो गया?”
क्यों माँ के आँचल की जगह ये भीड़ मिल गया?
जिसने अभी तक पहचाना नहीं खुद का नाम पूरा,
उसे सिखाया जा रहा है “ये हमारा, वो तुम्हारा…”
वो नहीं जानती हिंदू राष्ट्र क्या होता है,
वो तो बस पूछती है — “क्या खेलना, स्कूल जाना पाप होता है?”
उनके बच्चे चलेंगे मखमल की दरी पर,
तुम्हारे बच्चों को नसीब भी न होगा विद्यालय…
वो पढ़ेंगे विदेशों के स्कूलों में बढ़िया,
तुम्हारा बच्चा रौशनी के लिए ढूंढेगा डिबिया…
वो सीखेंगे इंग्लिश, लैपटॉप, रोबोटिक्स की बातें,
तुम्हारा बच्चा सीखेगा बस “मैडम आज किताब नहीं लाया”…
वो बनेंगे नेता, अफ़सर, नीतियों को रचने वाले…
तुम्हारे बच्चे बनेंगे उन्हीं की योजनाओं की उम्मीद में जीने वाले….
आज वो, कल उनके बच्चे चलाएंगे देश,
आज तुम,कल तुम्हारे बच्चों को मिलेगा वही घिसा, पीटा उपदेश..
गरिमा भारती (स्वतंत्र पत्रकार)
लेखिका लाइव सिटीज की पत्रकार रह चुकी हैं और यह कविता उनके ट्विटर हैंडल से लिया गया है.


