बिहार चुनाव 2025 के नतीजों ने न सिर्फ कांग्रेस को गहरा झटका दिया है, बल्कि राहुल गांधी की चुनावी रणनीति और उनकी यात्राओं की प्रभावशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस ‘वोटर अधिकार यात्रा’ को कांग्रेस ने बिहार की राजनीति में बड़ा गेम-चेंजर बताया था, वह जमीन पर कोई असर नहीं दिखा सकी।
यात्रा के बावजूद कांग्रेस का खराब प्रदर्शन
राहुल गांधी ने इस साल अगस्त में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ निकाली थी। यह यात्रा सासाराम से पटना तक 25 जिलों और 110 विधानसभा क्षेत्रों को कवर करते हुए करीब 1,300 किलोमीटर चली। लेकिन हैरानी की बात है कि यात्रा के पूरे रूट पर कांग्रेस को एक भी महत्वपूर्ण बढ़त नहीं मिली। कुल 61 सीटों में से पार्टी सिर्फ 5 सीटों—वाल्मीकि नगर, चनपटिया, अररिया, किशनगंज और मनीहरी—पर आगे रही। यह साफ दिखाता है कि कांग्रेस की जमीनी मौजूदगी और संदेश दोनों ही वोटरों को प्रभावित नहीं कर सके।
‘गांधी मैजिक’ बिहार में क्यों नहीं चला?
कांग्रेस मानती रही है कि पिछली ‘भारत जोड़ो यात्राओं’ ने उसे 2024 लोकसभा और 2023 तेलंगाना चुनावों में फायदा पहुंचाया था।
लेकिन बिहार में तस्वीर बिल्कुल उलट रही—
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NDA ने भारी जीत दर्ज की
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BJP: 91 सीटों पर आगे
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JDU: 80 सीटों पर आगे
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LJP (आरवी): 28 में से 22 पर बढ़त
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HAM: 6 में से 5 पर बढ़त
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RLM: 6 में से 3 पर आगे
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NDA की यह निर्णायक बढ़त दिखाती है कि राहुल गांधी का ‘वोट चोरी’ वाला आरोप बिहार के मतदाताओं को समझ नहीं आया।
कांग्रेस का आरोप बनाम जनता का भरोसा
कांग्रेस का दावा था कि बिहार का SIR (Special Intensive Revision) अभियान, मतदाता सूची में “बड़े पैमाने पर वोटरों को हटाने की BJP साज़िश” है।
यात्रा को इसी मुद्दे पर जनसमर्थन जुटाने का प्रयास बताया गया।
लेकिन चुनाव आयोग ने इन आरोपों को पूरी तरह गलत बताया, और चुनाव परिणामों ने भी दिखा दिया कि बिहार की जनता इन दावों से प्रभावित नहीं हुई।
महागठबंधन की अस्थिरता भी रही बड़ी वजह
कांग्रेस की हार के पीछे कई आंतरिक कारण भी रहे—
1. महागठबंधन में एकता की कमी
कांग्रेस और RJD के बीच रणनीति और नेतृत्व को लेकर तालमेल नहीं था।
2. तेजस्वी यादव को CM फेस घोषित न करना
कांग्रेस की हिचकिचाहट ने गठबंधन के वोटरों में भ्रम पैदा किया।
3. संयुक्त रणनीति का अभाव
महागठबंधन का संदेश मतदाताओं तक स्पष्ट तरीके से नहीं पहुंच पाया।
4. कार्यकर्ताओं का उत्साह अंतिम चरण में घटा
राहुल गांधी की यात्रा से जो ऊर्जा आई, वह चुनाव नजदीक आते-आते खत्म हो गई।
5. अंदरूनी झगड़े और फ्रेंडली फाइट्स
कई सीटों पर आपसी टकराव ने कांग्रेस और RJD दोनों को नुकसान पहुंचाया।
बिहार ने कांग्रेस के ‘मताधिकार अभियान’ को नकारा
बिहार चुनाव 2025 ने साबित कर दिया कि—
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केवल यात्राएँ चुनाव नहीं जितातीं,
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ज़मीनी संगठन, गठबंधन की एकता, और स्पष्ट नेतृत्व ज़रूरी है।
राहुल गांधी की यात्रा राजनीति यहाँ मतदाताओं को न तो जोड़ पाई, न ही प्रभावित कर सकी।
परिणाम बताते हैं कि बिहार के मतदाताओं ने स्थिरता, विकास और नेतृत्व की स्पष्टता को प्राथमिकता दी—और NDA को भारी समर्थन दिया।


