साल 2025 अब लगभग अपने अंत पर है, लेकिन अगर हिंदी सिनेमा की बात करें तो बीते 12 महीनों में बहुत कुछ बदलने के बावजूद, बहुत कुछ वैसा का वैसा ही बना रहा। बड़े सितारे, बड़े प्रोडक्शन हाउस, भारी-भरकम बॉक्स ऑफिस आंकड़े और सोशल मीडिया पर चलने वाली विचारधाराओं की जंग — इन सबके बीच सिनेमा कहीं न कहीं अपने असली उद्देश्य से भटकता नजर आया। इसी उथल-पुथल के बीच कुछ फिल्में उम्मीद की किरण बनकर उभरीं, तो कुछ ने यह सवाल छोड़ दिया कि हम दर्शक आखिर किस दिशा में जा रहे हैं।

साल की शुरुआत एक ऐसी फिल्म से हुई, जिसमें अक्षय खन्ना खलनायक की भूमिका में नजर आए, और संयोग देखिए कि साल का अंत भी कुछ उसी तरह की फिल्म के साथ हुआ। दोनों ही फिल्मों को करोड़ों दर्शकों ने देखा, और दोनों को ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर “इतिहास का सच” बताकर आक्रामक तरीके से डिफेंड किया गया। समस्या फिल्मों में नहीं, बल्कि उस माहौल में है जहां सिनेमा को एकतरफा विचारधारा का औजार बना दिया गया। शायद आने वाले वर्षों में यही फिल्में हमें इस दौर में हमारी सामूहिक चुप्पी और पसंद पर सवाल करने को मजबूर करेंगी।
‘होमबाउंड’ बनी उम्मीद की किरण
इसी अंधेरे माहौल में Homebound जैसी फिल्म ने सिनेमा प्रेमियों को थोड़ी राहत दी। यह फिल्म न सिर्फ कंटेंट के स्तर पर मजबूत साबित हुई, बल्कि इसने यह भी दिखाया कि संवेदनशील और ईमानदार कहानियां आज भी दर्शकों को छू सकती हैं। अगर यह फिल्म ऑस्कर की रेस में आगे बढ़ती है, तो यह भारतीय सिनेमा के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हो सकती है — यह साबित करते हुए कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी प्रोपेगेंडा नहीं, बल्कि सच्ची कहानी की जीत होती है।
2025 पर मैडॉक फिल्म्स का दबदबा
घरेलू बॉक्स ऑफिस की बात करें तो 2025 पर सबसे ज्यादा असर दिनेश विजान की मैडॉक फिल्म्स का रहा। इस प्रोडक्शन हाउस ने एक ही साल में छह फिल्में रिलीज़ कीं, और सातवीं अभी कतार में है। चाहे बॉक्स ऑफिस के आंकड़े जैसे भी बताए जाएं, आम दर्शक के लिए यह आंकड़े आखिरकार यह तय करते हैं कि आने वाले समय में हमें किस तरह की फिल्में देखने को मिलेंगी। मैडॉक ने कंटेंट और कमर्शियल के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की, जिसने उन्हें इंडस्ट्री के शीर्ष खिलाड़ियों में ला खड़ा किया।
धर्मा और YRF का उतार-चढ़ाव भरा साल
जहां मैडॉक लगातार मजबूती से आगे बढ़ा, वहीं धर्मा प्रोडक्शंस और यशराज फिल्म्स (YRF) के लिए 2025 बेहद अजीब रहा। कुछ फिल्मों ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया, तो कुछ फैसले ऐसे रहे जिन्होंने इंडस्ट्री को चौंका दिया। कुछ ही महीनों के भीतर इन बड़े बैनरों ने सफलता और असफलता — दोनों का स्वाद चख लिया। यह साफ संकेत है कि केवल नाम और विरासत के सहारे अब सिनेमा नहीं चल सकता।
बॉक्स ऑफिस बनाम सिनेमा
2025 ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या सिनेमा सिर्फ कमाई का जरिया बनकर रह गया है? सोशल मीडिया पर आंकड़ों की बहस, फर्जी कलेक्शन के दावे और ट्रोल आर्मी की लड़ाइयों के बीच असली दर्शक कहीं खो गया। लेकिन फिर भी, जब-जब कोई ईमानदार फिल्म सामने आई, उसने यह साबित किया कि दर्शक आज भी अच्छी कहानी को पहचानता है।
साल 2025 हिंदी सिनेमा के लिए विरोधाभासों का साल रहा — जहां एक तरफ प्रोपेगेंडा और मार्केटिंग का शोर था, वहीं दूसरी तरफ संवेदनशील सिनेमा ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। आने वाला समय तय करेगा कि हम किस रास्ते को चुनते हैं — भीड़ का या विवेक का।


